Sri Srimd Bhakti Dayita Madhav Goswami Maharaj (Founder Acharya Sree Chaitanya Gaudiya Math)
Tuesday, 9 January 2018
Tuesday, 2 January 2018
श्रीमद्भागवत् की शिक्षा
[चंडीगढ़ और हैदराबाद मठ के वार्षिक उत्सव में श्रीलगुरुदेव द्वारा दिए गए प्रवचन
का सारमर्म]
‘श्रीमद्भागवत्’ जगदगुरु श्रीकृष्णदैव्पायन? वेदव्यास मुनि का सबसे आखिरी
अवदान है। श्रीमद्भागवत् का पहला नाम
चतुःश्लोकी है। कारण, श्री नारद जी ने, श्री
व्यास जी के चित्त को स्थिर व शान्त करने के लिए, उपाय के रूप में चार श्लोकों का
उपदेश दिया था, जो उनको श्रीनरनारायण जी से प्राप्त हुए थे। इन श्लोकों का तात्पर्य केवल हरि सेवामय या केवल श्रीहरि-संकीर्त्तन-तात्पर्यमय
है। इस उपदेश की प्राप्ति करके श्री
व्यासदेव जी ने स्व-स्वरूप, पर-स्वरूप और विरोधी स्वरूप के ज्ञान को प्राप्त करके,
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का प्रतिपादन करने वाली पूर्वकृत आलोचनाओं को तृणवत
तुच्छ समझकर, श्रीकृष्ण-प्रेम को ही जीव का एक मात्र प्रयोजन जानकर, उसे विस्तार
पूर्वक अठारह हज़ार श्लोकों में लिख दिया। वह ही सर्वशास्त्र शिरोमणि
ग्रन्थराज ‘श्रीमद् भागवत’ है।
श्रीमद्भागवत् का श्रवण, कीर्तन, अनुध्यान ऐसा है कि निष्कपट अनुमोदन करने
मात्र से ही देवद्रोही, विश्वद्रोही, अतिपातकी, महापातकी तक भी शीघ्रातिशीघ्र पवित्र
होकर चित्त की पूर्ण स्थिरता को प्राप्त करने में समर्थ होते हैं। यह हरि-संकीर्त्तनमय भागवत-धर्म अत्यन्त गम्भीर, अत्यन्त उदार, अत्यंन्त
व्यापक तथा सब जीवों का आश्रय है।
श्रीमद्भागवत् शास्त्र में वर्णित धर्म को भागवत-धर्म कहते हैं या यूँ कहें कि
भगवान् से सम्बन्धित जो जो भी धर्म हैं, उन्हें भागवत धर्म कहते हैं, इसीलिये
भगवान् के भक्तों के धर्म को भी भागवत धर्म कहते हैं। सद्धर्म, आत्म-धर्म, सनातन धर्म और भक्ति-धर्म भी इसी के अन्य नाम हैं। श्रीमद्भागवत् के 11वें स्कन्ध में महाराज निमि और नवयोगेन्द्रों के संवाद
में भागवत धर्म का स्वरूप और उसका आचरण विस्तार रूप से वर्णित हुआ है। नवयोगेन्द्रों में से एक कवि नामक मुनि भागवत धर्म के स्वरूप का वर्णन करते
हुये कहते हैं,
ये वै भगवता प्रोक्ता उपाया
ह्यात्मलब्धये।
अजः पुंसामविदुषां विद्धि भागवतान्
हितान्।।
(श्रीमद्भा. 11/2/34)
कवि मुनि कहते हैं कि भगवान् ने
स्वयं अपने मुख से नासमझ व्यक्तियों को भी अनायास आत्मलाभ अर्थात् अपनी प्राप्ति
के जो तमाम आसान-आसान उपाय बताये हैं, उन्हीं को भागवत धर्म समझना।
मनु आदि ऋषियों द्वारा प्रणीत धर्म को वर्णाश्रम-धर्म कहते हैं। भागवत् धर्म के वक्ता स्वयं भगवान् हैं, इसलिये भगवान् की प्राप्ति का इससे
सुन्दर, सहज व सुगम मार्ग कोई नहीं हो सकता। आँखे बन्द करके दौड़ने से भी इस राह में न फिसलन
है और न पतन ही। कारण, भागवत धर्म के आरम्भ में ही
भगवान के चरणों में ली गयी शरणागति की बात है। सर्वशक्तिमान भगवान् जिनके रक्षक और पालक होते हैं, उनके पतन की आशंका भला
कहाँ रह जाती है।
भागवत धर्म का अनुशीलन कैसे करूँ? Practical side क्या है, उसके सम्बन्ध में
कहते हैं—
श्रवणं कीर्तनं ध्यानं हरेरद्भुतकर्मणः।
जन्मकर्मगुणानान्च तदर्थे अखिल
चेष्टितम्।।
इष्टं दत्तं तपो जप्तं वृतं
यच्चात्मनः प्रियम्।
दारान् सुतान् गृहाण् प्राणान् यत्
परस्मै निवेदनम्।।’
(श्रीमद्भा.
11/3/27-28)
भगवान् की लीलाएँ अद्भुत हैं। उनके जन्म-कर्म और गुण दिव्य हैं। उन्हीं का श्रवण,
कीर्त्तन और ध्यान करना तथा शरीर से जितनी भी चेष्टाएं हों, सब भगवान् के लिए करना
सीखे। यज्ञ, दान, तप अथवा जप, सदाचार का पालन और स्त्री, पुत्र, घर, अपना जीवन,
प्राण तथा जो कुछ अपने को प्रिय लगता हो- सबका सब भगवान् के चरणों में निवेदन
करना, उन्हें सौंप देना सीखे अन्यथा ये वस्तुएँ भक्ति में बाधक हो जाती हैं।
{अखिल रसामृत मूर्ति श्रीकृष्ण के पादपद्मों की सेवा ही जीव
का एकमात्र स्वार्थ है।}
Wednesday, 20 December 2017
नाम भजन ही सर्वोतम साधन
श्री चैतन्य वाणी का उपदेश:
श्रीकृष्ण-नाम-संकीर्त्तन
[‘श्री चैतन्य वाणी’ के चौथे-वर्ष
में प्रवेश पर श्रील गुरुदेव द्वारा वन्दना]
श्री चैतन्य वाणी का जिनके कर्ण-कुहरों में प्रवेश
हुआ, उनका ही ह्रदय मार्जित हुआ है। श्रीचैतन्य वाणी ने
केवल मात्र उनके हृदयों का मार्जन कर पुनः-पुनः जन्म-मृत्यु के हाथों से उनका
उद्धार ही नहीं किया बल्कि उन्हें वास्तव मंगल-स्वरुप, श्रीगौर-कृष्ण के सुस्निग्ध कृपा लोक में प्रकाशित
कराते हुए, उनके पास
स्व-स्वरुप (जीव स्वरुप), माया का
स्वरूप तथा श्रीभगवान् का स्वरूप प्रकशित कर, उनके ह्रदय
में आनन्द समुद्र-वर्धन व कदम-कदम पर पूर्णामृत का आस्वादन कराते हुए उन्हें
उन्नतम, सुनिर्मल आनन्द सागर में निमज्जन का सौभाग्य प्रदान
किया है।
इस प्रकार महिमायुक्त भगवद्-वाणी की वन्दना करते हुए, हम आज नववर्ष में आत्म-पवित्रता के लिए प्रयत्नशील
होंगे। ‘श्री चैतन्य वाणी’ की जय हो।
इसके श्रद्धालु, श्रवण व
कीर्तन करने वाले सेवक, इसका आदर
करने वाले व इसका अनुमोदन करने वाले भी जययुक्त हों।
‘श्रीचैतन्य
वाणी’ ने हमें अपने तुच्छ स्वार्थों के केन्द्रों में न
भटकाकर, सर्वकारण-कारण श्रीगोविन्द जी के केन्द्र बनाते हुए
जीवन-यापन करने का उपदेश दिया है। प्राणियों की बहुत सी केन्द्रों वाली चेष्टाओं
से सु-फल तो होता ही नहीं बल्कि आपसी एकता में भी बाधक है। हाँ, मूल केंद्र के अनुकूल यदि अगणित केन्द्र भी हों तो
कोई नुकसान नहीं बल्कि ये तो एकता के बन्धन को दृढ़ ही करेंगे।
‘श्री चैतन्य वाणी’ ने अन्याय, अधर्म, हिंसा तथा कुविचारों का प्रतिरोध करके एकता के
प्रयत्नों का ही उपदेश दिया है। प्रत्येक
जीव की सत्ता, चिद्-तत्त्व
से निकली है, चिद्-तत्त्व
द्वारा ही संरक्षित है तथा चिद्-तत्त्व में ही चिर-संश्रित है। यहाँ तक कि
अचित्सत्ता का भी चिद्-तत्त्व ही कारण है। अतएव तमाम चिद् व अचिद् सताएँ जिनके ऊपर
सम्पूर्ण रूप से निर्भर हैं, वे ही तमाम
कारणों के कारण, मूल
चिद्-तत्त्व, भगवान् श्री
कृष्ण सभी जीवों के एकमात्र आश्रय-स्वरूप हों-यही जीवों का मंगल करने वाली ‘श्री चैतन्य वाणी’ का हार्दिक अभिप्राय
है।
विरूप का अभिमान, दम्भ, दर्प, क्रोध, हिंसा, कपटता आदि सब
परस्पर में भेद को उत्पन्न करते हैं तथा आपस में स्वार्थ के टकराव की स्थिति बना
देते हैं। भगवद्-दास्य-अभिमान, अहिंसा, सरलता, सुनीचता, सहनशीलता, अमानित्त्व, मानदत्त्व तथा क्षमाशीलता आदि गुण मनुष्यों को आपसी
प्रीति-सम्बन्धों की ओर आकृष्ट करते हैं। ‘श्री चैतन्य
वाणी’, चिन्मयी-सेवा-भूमिका में परस्पर सभी की मिलन-प्रयासी
है। आनन्दमय, विभु व अकारण
करुणामय प्रभु की निष्कपट सेवा-वृति ही जीव को श्रीभगवद्-सान्निध्य में ला देती
है। अनु-चिद् का विभु-चिद् के साथ, दास का अपने
नित्य प्रभु के साथ तथा आनन्द-कण का आनन्द-समुद्र के साथ सुमिलन होता है। आनंद के
मिलने पर लेश मात्र भी दुःख नहीं रह पाता। भोग-पर्वृति अन्य-संग कराती है, जबकि त्याग-प्रवृति श्रीभगवद्-मिलन की हमराही बन जाती
है।
‘श्री चैतन्य
वाणी’ सभी जीवों का सतर्क करते हुए कहती है कि तुम्हारी
तमाम सम्पदा, इन्द्रिय, मन, वाक्य व
बुद्धि आदि, यदि अखिल
रसामृत मूर्ति श्रीकृष्ण में नियोजित नहीं होंगे, तो निश्चित
रूप से अशांति ही फैलायेंगे। ‘श्री चैतन्य वाणी’, देशवासियों
के द्वार-द्वार पर जाकर उन्हें उनके वास्तविक स्वार्थ को समझाने के लिए उपदेश कर
रही है। इसका कहना है कि शुद्ध जीव-सत्ता, स्थूल व
सूक्ष्म शरीर की उपाधियों में आसक्त तथा आवृत है। पूर्व संस्कारवशतः, जड़ाभिनिवेश को परित्याग करने में असमर्थ होने से भी, जीव वर्तमान की अवांछित अवस्था में अपने अभीष्ट लाभ
के लिए, श्रीकृष्ण-प्रीति के अनुकूल विषयों को स्वीकार करें
तथा इसी भावना से ही शरीर व कुटुम्ब का पालन-पोषण करें। ‘श्री चैतन्य वाणी’ भरोसा देते
हुए कहती है कि जीव केवल चरम व पूर्णानन्द
की प्राप्ति का ही लक्ष्य रखें तथा आनन्द-प्राप्ति (भगवद्-प्राप्ति) के बाधक, जिन-जिन भोगों को परित्याग करने में उनको असमर्थता
प्रतीत हो रही है, उन-उन भोगों
को मज़बूरी से, दुःखी मन से
व उसकी निन्दा करते हुए उन्हें अंगीकार करते हुए जीवन निर्वाह करते रहने से, जल्दी ही उन अवांछित अवस्थाओं से छुटकारा मिल जाएगा।
अवांछित-अनुशीलन के प्रति, किसी भी
अवस्था में आत्म-श्लाघा नहीं करनी होगी अर्थात् भगवान् की भक्ति के प्रतिकूल
कार्यों को करने में अपना बड़प्पन नहीं मानना चाहिए। निरन्तर श्रीकृष्ण नाम के
अनुकूल अनुशीलन के द्वारा अर्थात् श्रीकृष्ण नाम के श्रवण, कीर्तन, स्मरण आदि के
द्वारा श्रद्धालु व्यक्ति, धीरे-धीरे
श्रीकृष्ण का सान्निध्य प्राप्त करने में सफलता प्राप्त कर लेते हैं।
हम वर्तमान में, परस्पर
विरोधी व अति कष्टदायक हिंसा व प्रतिहिंसा से जर्जरित, अशान्त चित्त वाले मनुष्य-समाज के प्रति, दाँतों में
तिनका लेकर अर्थात् अत्यन्त दीनता के साथ कातर भाव से ‘श्री चैतन्य वाणी’ का बार-बार
श्रवण-कीर्त्तन करने के लिए अनुरोध करते हैं।
‘श्री चैतन्य
वाणी’ के संस्पर्श से मनुष्य-समाज, जड़ीय भावों को परित्याग करने में समर्थ हो जाता है।
यही नहीं, ‘श्री चैतन्य वाणी’ के संस्पर्श
में आकर, मनुष्य
मृत्यु-भय से मुक्त होकर, श्रीहरि की
चिद्-लीला आस्वादन का अधिकारी हो सकता है।
‘श्री चैतन्य
वाणी’ कृपा करके जीवों के कर्ण-कुहरों अर्थात् कानों में
प्रविष्ट होकर, उन्हें तमाम
क्लेशों से मुक्त करते हुए प्रेमामृत में आस्वादन का सौभाग्य प्रदान करा कर
कृतार्थ करें-यही नववर्ष में इस दास की प्रार्थना है।
{अधोक्षज वस्तु की अप्राकृत इन्द्रियाँ हैं। उन्हीं
इन्द्रियों के द्वारा वे अप्राकृत विलास करते हैं। उनका यह विलास नित्य है। उस
विलास के ईंधन के रूप में प्रकाशित होना ही प्रत्येक जीव का आत्मधर्म है।}
Thursday, 23 November 2017
भगवद्-भक्त की दासता
[श्रील गुरुदेव जी ने 2 मार्च 1961, 18 फाल्गुन की गौर पूर्णिमा तिथि के दिन, ‘श्री चैतन्य वाणी’ नामक, एकमात्र पारमार्थिक मासिक पत्रिका का प्रकाशन किया। इसी
पत्रिका के पंचम वर्ष में प्रवेश करने पर उनकी वन्दना करते हुए, मठाश्रित सेवकों के
आत्यन्तिक मंगल के लिए, परमाराध्य श्रील गुरु महाराज जी ने एक उपदेशावली प्रेषित
की। ये उपदेशावली निम्न प्रकार से है।]
“नव वर्ष में हम सकातर भाव से ‘श्री चैतन्य वाणी’ की वन्दना करते हैं। वे अपने
कृपा-बल से हमारे चित्त को विशुद्ध करते हुए, हमें अपनी सेवा में आत्मनियोग करने
का सौभाग्य प्रदान करें। ‘श्री चैतन्य वाणी’ सर्वत्र विश्व में अपने प्रभाव का
विस्तार करते हुए, अपने वैभव को सुप्रतिष्ठित करें। ‘श्री चैतन्य वाणी’ के सेवक इस
कंगाल के प्रति कृपा दृष्टिपात करें। सवैभव ‘श्री चैतन्य वाणी’ की जय हो।
सेवक बहुत प्रकार के होते हैं। उनमें से प्रीति द्वारा
प्रवर्तित, कर्त्तव्यबोध से परिचालित एवं अपने ही प्राकृत स्वार्थ से उत्साहित
सेवक ही मुख्य रूप से देखे जाते हैं। इनमें से तीसरे नम्बर वाले सेवक को
शुद्ध-सेवक नहीं कहा जाता। कारण, यहाँ पर सेव्य व सेवक का
सम्बन्ध हमेशा रहने वाला नहीं है। इस अवस्था में यदि उसका
प्राकृत-स्वार्थ पूरा नहीं होगा तो उसकी सेवा बन्द हो जाएगी और सेव्य के साथ
सम्बन्ध भी नहीं रहेगा। वास्तव में ये बनिया-वृति की तरह
कपटता मात्र है। यहाँ अपने प्रयोजन की सिद्धि के
लिए अर्थात् अपना काम हासिल करने के लिए ही सेव्य को स्वीकार किया जाता है और यहाँ
पर जो प्रयोजन है, वह भी अनित्य है; इसलिए सेव्य और सेवक का सम्बन्ध भी अनित्य है। अतः इस सेवा में नित्य-भूमिका का कोई अनुष्ठान नहीं है ये सब कर्मानुष्ठान ही
है। सर्वप्रथम कही गयी सेवा (अर्थात्
प्रीति द्वारा की जाने वाली सेवा) ही सुनिर्मला है व नित्य है। दूसरे नम्बर पर कही गयी सेवा, अनुराग द्वारा परवर्तित न होने पर भी,
कर्त्तव्य व नीति बोध से उत्पन्न होने के कारण व नित्य स्थितशील होने के कारण उसे
सेवा कहा जा सकता है। अनुराग से उत्पन्न अथवा विधि या
कर्त्तव्य-जनित सेवा ही सेवा-शब्द वाच्य है। इन्हें ही “राग भक्ति” व “विधि
भक्ति” कहते हैं। इन दोनों अवस्थाओं में सेवा नित्य
है तथा सेव्य व सेवक का सम्बन्ध भी नित्य है।
वैसे सेवक स्वतन्त्र होता है, परन्तु उसकी स्वतंत्रता, सेव्य की प्रीति के
परतन्त्र होने के कारण, कोई-कोई सेवक को परतन्त्र भी कहते हैं, प्रीति-सूत्र में
बंधने पर भी, स्वतंत्रता का अभाव वहाँ नहीं है, हाँ, स्वेच्छाचारिता कहने से जो
समझा जाता है, वह सेवक में नहीं होती। सेवक कोई लकड़ी की गुड़िया नहीं है। चित्त्-जगत् की वस्तु होने के कारण, सेवक की स्वतंत्रता नित्य स्वीकारणीय है;
किन्तु ये स्वतंत्रता कभी भी सेव्य की सेवा के विरोध में प्रयुक्त नहीं होती। दो स्वतन्त्र वस्तुओं के आपसी प्रीति-पूर्ण मिलन से ही ‘रस’ की उत्पत्ति होती
है। उक्त ‘प्रेम-रस’, सेव्य व सेवक
दोनों को प्रफुल्लित करता है तथा इसी कारण वे एक-दूसरे से विच्छेद को सहन करने में
असमर्थ हो जाते हैं। कभी-कभी प्रेम की गाढ़ता को बढ़ाने
के लिए विरह की आवश्यकता भी दिखाई देती है- ये ही ‘चिद्-विलास’ है। सेवक की बहुत तरह की सेवा देखी जाती है। शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य तथा कान्त भावों में कर्मशः सेवा की उत्कृष्टता
होती है। किसी भी भाव में सेवा-वृति का
अभाव नहीं है। सेवा, बोधमयी व सुख-स्वरूपा होती
है; अज्ञान रूपा नहीं होती। इसलिए भक्ति को आचार्य लोग
‘ह्लादिनी-सार-समाश्लिष्ट सम्वित्वृति’ कहते हैं।
भगवद्-भक्त अथवा सेवक की पदवी को प्राप्त करने के लिए श्रेष्ठ-श्रेष्ठ देवता
भी इच्छा करते हैं। थोड़े से भाग्य से कोई भी
भगवद्-भक्त नहीं कहला सकता। पूरे ब्रह्माण्ड में कोई भी पदवी,
भगवद्-भक्त की पदवी के बराबर नहीं हो सकती। जिनको भगवद्-तत्त्व का बोध नहीं
है अर्थात् जो भगवद्-तत्त्व को नहीं जानते, वे भक्त की मर्यादा को भी नहीं जान
सकते। अतः भगवद्-भक्त की अमर्यादा करने
वाला, तत्त्वहीन व्यक्ति मूढ़ है और कुछ भी नहीं। अतः अपने सौभाग्य को अपने पैरों तले कुचलने वाला ही, भगवद्-सेवक को तुच्छ
समझता है। सेवक, सेव्य को सेवा को तारतम्यता
के अनुसार वश में कर लेता है। अनन्त ब्रह्माण्ड और उनमें रहने
वाले अनंत जीवों की सृष्टि व लय के मूल कारण जो भगवान् हैं, वे कितने महान् है। तमाम ऐश्वर्य, वीर्य, यश, श्री, ज्ञान व वैराग्य उनमें परिपूर्ण मात्रा में हैं। जो भगवान् समस्त तत्त्वों की खान हैं, वे भगवान् भी जिनके प्रेम के वशीभूत हो
जाते हैं; वे भगवद्-विजयी ‘भक्त लोग’ कितने महान् हैं, जाना नहीं जा सकता। इस प्रकार देखा जाता है कि भगवद्-सेवक की मर्यादा ही ब्रहमांड में सर्वोपरि
है।
सेवक की समीपता, सेव्य की समीपता दिलाती है। सेवक की सेवा, सेव्य की सेवा प्रदानकारी व सेव्य को वशीभूत कराने वाली होती
है। इसलिए विवेकी लोग अपने अभीष्ट की
प्राप्ति के लिए, श्रीभगवद्-सेवक के आज्ञावाही दास, साधु-भक्त-संगी और सेवक होते
हैं। भक्त अथवा दास की भक्ति व सिद्धि
सुनिश्चित् है।
भगवद्-भक्त लोग भगवान् की अनेकों प्रकार की सेवाएँ प्रकट करते हैं एवं नाना
प्रकार की योग्यता वाले, मंगल-प्रार्थी साधकों को उनकी योग्यता के अनुसार, सेवा का
सौभाग्य प्रदान करते हैं, वह सेवा ही धीरे-धीरे उनको श्री भगवद्-प्रेम प्राप्ति
कराने का कारण बनती है। भगवद् भक्त की दासता ही
श्रीभगवद्-प्राप्ति का मुख्य उपाय है।”
Sunday, 19 November 2017
भगवद्-कृपा प्राप्ति का उपाय: शुद्ध-भक्त का आनुगत्य’
भगवान् अस्मोध्..र्व तत्त्व हैं इसलिये उन्हें कोई भी अपनी योग्यता के बल पर
नहीं जान सकता। यदि ऐसा माना जाये कि किसी ने
अपनी योग्यता के बल पर भगवान् को प्राप्त कर लिया है तो इससे भगवान् की भगवत्ता,
सर्वशक्तिमत्ता व उनका असीमत्त्व नहीं रहता। भगवान् की इच्छा ही भगवान् को
प्राप्त करने का एकमात्र उपाय है और भगवान् की इच्छा का अनुसरण करने का दूसरा नाम
प्रीति व भक्ति है। हम यदि भगवान् की इच्छा अर्थात्
श्रुति और स्मृतियों के अनुसार चलें तो हमारे लिये यही भगवान् की कृपा प्राप्त
करने का उपाय स्वरूप होगा। किन्तु प्रश्न यह है कि भगवान् की
प्रीति के अनुकूल शास्त्र का विधान समझ में कैसे आयेगा, इसके उत्तर में कहते हैं
कि उसके लिये सत्संग की एवं शुद्ध-भक्त का आनुगत्य करने की आवश्यकता है।
भक्ति दो प्रकार की होती है – वैधी और रागानुगा। श्रीकृष्ण रागानुगा भक्ति के ही वशीभूत हैं। एक भक्त ने कहा है –
‘श्रुतिमपरे स्मृतिमितरे भारतमन्ये
भजन्तु भव भीताः।
अह मिह नन्दं वन्दे यस्यालिन्दे
परब्रह्म।।’
(चै.च.म. 19/96 पद्यावली 1/126 से
उद्धरित)
कई व्यक्ति संसार सागर से भयभीत हो कर श्रुति, कई स्मृति तो कई भयभीत होकर
महाभारत का भजन करते हैं। मैं कहता हूँ यदि वे ऐसा करते हैं
तो करें किन्तु मैं तो नन्द महाराज की वन्दना करता हूँ जिनके आंगन में परब्रह्म
श्रीकृष्ण नाना प्रकार के खेल खेलते हैं।
नन्द महाराज एवं यशोदा माता ने असीम वस्तु को अपने शुद्ध प्रेम द्वारा वशीभूत
कर लिया है। यदि ऐसे भक्त के दरवाज़े तक मैं जा
सकूँ तो भगवान् के दर्शन तो अपने आप ही हो जायेंगे। दोनों तरफ़ की बात को समझने के लिये हमें सावधानी से चेष्टा करनी होगी। भगवद् भक्त हमेशा भगवान् का सुख चाहते हैं। यदि कोई व्यक्ति भगवान् के सुख की इच्छा करता है तो उसकी इस भावना व क्रिया के
फलस्वरूप भक्त उसके गुलाम हो जाते हैं। जबकि दूसरी ओर भगवान् हमेशा अपने भक्तों का सुख चाहते हैं। इसलिये भक्त को प्रेम करने से भगवान् उसके वशीभूत हो जाते हैं और यही कारण है
कि भगवद्-भक्त की प्रेमवश सेवा करने वाले व्यक्ति भगवान् की कृपा अति सहजता से
प्राप्त कर सकते हैं। अंग्रेज़ी में एक कहावत है कि “If
you love me, love my dog.”— भगवान् को प्रेम करना कठिन नहीं है, इस प्रेम में
विद्या, ऐश्वर्य, रूप, यौवन आदि की आवश्यकता नहीं है—
जन्मैश्वर्यश्रुत-श्रीभिरेधमानमदः
पुमान्।
नैवर्हत्यभिधातुं वै
त्वामकि..न्चनगौचरम्।।
(श्रीमद्भा. 1/8/26)
अर्थात् जो व्यक्ति जन्म, ऐश्वर्य,
पाण्डित्य और रूप आदि के अभिमान में प्रमत्त
रहते हैं, वे लोग अकिन्चन व्यक्तियों के ग्रहणीय श्रीकृष्ण नाम का कीर्त्तन
करने में असमर्थ होते हैं।
दुनियाँदारी के अभिमान यदि हमारे दिल में स्थान बना लें, और यदि हम कनक,
कामिनी व प्रतिष्ठा के पीछे भागते रहें तो ऐसे चित्त में भगवान् का आगमन कैसे
होगा? बाहर दरवाज़े पर ‘स्वागतम्’ लिखा रहने पर भी अन्दर कूड़ा-कर्कट भरा रहने के
कारण बैठने का स्थान न देखकर घर आया हुआ व्यक्ति जैसे वापस चला जाता है, उसी
प्रकार बाहर-बाहर से हम भगवान् के स्वागत की बात करें और हृदय में और-और कामनायें
भरकर रखें तो ऐसे में यदि भगवान् आ भी जाएँ तो बैठने का स्थान न देखकर वापस चलें
जायेंगे।
Footnote:
वैधी भक्ति : जिस समय बद्ध जीव का कृष्णेतर विषयों में प्रगाढ़ अनुराग होता है, उस
समय उसका कृष्ण के प्रति अनुराग न के बराबर होता है। ऐसी दशा में कल्याणकामी जीव केवल
शास्त्र की आज्ञा से कृष्ण का भजन करता है। यह भजन ही वैधभजन है।
रागानुगा भक्ति : श्रीदाम-वसुदाम, श्रीनन्द-यशोदा और ललिता-विशाखा आदि
व्रजवासियों की श्रीकृष्ण के प्रति रागात्मिका-भक्ति होती है। और उन व्रजवासियों
के भावों के अनुगत रहकर जो साधनभक्ति की जाती है, उसे रागानुगा भक्ति कहते हैं।
इष्ट वस्तु श्रीनन्दनन्दन के प्रति प्रगाढ़ तृष्णा राग का स्वरूपलक्षण है तथा उनमें
गाढ़ी आसक्ति–राग का तटस्थलक्षण है। ऐसी रागमयी भक्ति को रागात्मिका भक्ति कहते हैं।
{“ब्राह्मणानां सहस्त्रेभ्यः सत्रयाजी विशिष्यते।
सत्रयाजिसहस्त्रेभ्यः सर्ववेदान्तपारगः।।”
“सर्ववेदान्तवित्कोट्या विष्णुभक्तो विशिष्यते।
वैष्णवानां सहस्त्रेभ्यः एकन्त्येको विशिष्यते।।”
(भक्ति संदर्भ 177 संख्याधृत गारुड़ वाक्य)
अर्थात् हज़ार ब्राह्मणों की अपेक्षा एक याज्ञिक श्रेष्ठ है,
हजार याज्ञिकों की अपेक्षा एक सर्ववेदान्त शास्त्रज्ञ श्रेष्ठ है। एक करोड़
सर्ववेदान्त शास्त्रज्ञों की अपेक्षा एक विष्णु भक्त श्रेष्ठ है। हज़ार वैष्णवों की
अपेक्षा एक एकान्तिक (अनन्य) भक्त श्रेष्ठ है।}
Friday, 17 November 2017
सच्चिदानंदविग्रह श्रीगोविन्द कृष्ण ही परमेश्वर हैं।
सच्चिदानंदविग्रह श्रीगोविन्द
कृष्ण ही परमेश्वर हैं। वे अनादि, सबके आदि और समस्त कारणों के कारण हैं।
श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु जी ने भी नन्दनन्दन श्रीकृष्ण को ही सर्वोत्तम
आराध्य रूप से निर्देश किया है। जीव की हर प्रकार की इच्छित वस्तु
की सर्वोत्तम परिपूर्ति एक मात्र नन्दनन्दन श्रीकृष्ण की आराधना से ही हो सकती है। किन्तु ये सब बातें हम समझेंगे कैसे? जब तक हमारा (prejudice) स्वार्थ रहेगा,
तब तक हम समझ नहीं सकेंगे। भगवद् तत्त्व को समझने के लिये
हमें जिस ज्ञान व अधिकार की आवश्यकता है, वह ज्ञान व अधिकार न आने तक सांसारिक
बहुत सी योग्यता रहने पर भी हम उसकी (उस भगवद् तत्त्व की) उपलब्धि नहीं कर पायेंगे। अधिकार प्राप्ति के लिये हम किसी भी तरह का साधन करने के लिए तैयार नहीं हैं। दम्भ से उन्हें नहीं जाना जा सकता, कारण, वे unchallengeable truth हैं। उनका न तो कोई कारण है, न कोई उनके समान है, उनसे अधिक होने का तो प्रश्न ही
नहीं है। अतः उन भगवान् को जानने के लिये
उनकी कृपा के अतिरिक्त किसी अन्य उपाय को स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसलिये यदि भगवद्-तत्त्व की उपलब्धि करनी है तो प्रणिपात, परिप्रश्न और
सेवा-वृति लेकर तत्त्वदर्शी ज्ञानी गुरु के पास जाना होगा। श्रीमद् भगवद् गीता में भी ऐसा ही निर्देश दिया है:-
“तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन
सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं
ज्ञानिनस्तत्त्व दर्शिनः।।”
(श्रीगी. – 4/34)
“तत्त्वज्ञान प्राप्त करने की विधि बताते हुए कह रहे हैं –
अर्जुन! ज्ञान का उपदेश करने वाले गुरु के पास जाकर उन्हें दण्डवत् प्रणाम करके
जिज्ञासा करो, हे भगवन्! मैं संसार में क्यों फंसा हुआ हूँ? इससे किस प्रकार
छुटकारा मिलेगा? इस प्रकार परिप्रश्न (युक्तिसंगत प्रश्न) करने के पश्चात् सेवा
पूजा के द्वारा उन्हें प्रसन्न करो।”
(श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु: श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु त्रिकाल सत्य, पुराण पुरुष हैं। श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु सन् 1486 में श्रीनवद्वीप
क्षेत्र के अंतर्गत श्रीधाम मायापुर में अवतरित हुए। श्रीचैतन्य महाप्रभु जी ने नन्दनन्दन श्रीकृष्ण को परमतम् तत्त्व
एवं उनके साथ जीव की भेदाभेद सम्बन्ध की बात बताई है। श्रीमन्महाप्रभु जी के अनुसार कलियुग में
कृष्ण-प्रीति प्राप्त करने का सर्वोत्तम साधन है, श्रीकृष्ण नाम–संकीर्त्तन। जगत् के जीवों को श्रीकृष्ण–भक्ति की
शिक्षा देने के लिए स्वयं श्रीकृष्ण ही श्रीकृष्ण चैतन्य के रूप में प्रकट हुए। श्रीभागवत पुराण में, भविष्य
पुराण में, महाभारत में, मुण्डकादि उपनिषदों में इस सम्बन्ध में बहुत प्रमाण होने
से यह बात सिद्ध होती है।)
{भगवान् की आराधना करने के लिये
भगवद्-तत्त्व को समझने की जरुरत है।}
Thursday, 9 November 2017
भगवान् की आराधना के लिये भगवद्-त्तत्व को समझने की ज़रूरत है
आसाम प्रचार-भ्रमण के समय श्रील गुरु महाराज जी गोहाटी में कुछ दिन रहे। उस
समय आसाम के तत्कालीन मुख्यमन्त्री श्री गोपीनाथ बड़दलई जी के निवास पर भागवत पाठ
की व्यवस्था हुई थी। श्रीगुरु महाराज जी के श्रीमुख से शुद्ध भक्ति सिद्धान्त
सम्मत एवं सुयुक्तिपूर्ण श्रीमद् भागवत की अपूर्व ह्रदयग्राही व्याख्या सुनकर सभी
श्रोता मुग्ध हो जाते। एक दिन श्री गोपीनाथ बड़दलई भागवत पाठ के समाप्त होने पर
श्रील गुरु महाराज जी की भागवत व्याख्या की हार्दिक प्रशंसा करते हुए कहने लगे- “आपसे
भागवत पाठ सुन कर मुझे ऐसा लगता है कि आपके भागवत पाठ का उद्देश्य एवं महात्मा
गाँधी जी के भाषणों का उद्देश्य एक ही है। आप भी अनेक शास्त्र-प्रमाणों एवं
युक्तियों द्वारा बहुत कुछ समझाने के बाद सभी से कृष्ण नाम करवाते हैं और गाँधी जी
भी अपने भाषणों में अनेक प्रसंग सुना कर अन्त में सभी को ‘रामधुन’ करवाते हैं। आप
दोनों का ही उद्देश्य है- सभी को हरिनाम करवाना। मैं तो आप दोनों में कोई भी अन्तर
नहीं देखता हूँ। आपका इस सम्बन्ध में क्या मत है, मैं जानना चाहता हूँ।”
श्री गोपीनाथ बड़दलई की श्रील गुरुदेव के प्रति प्रगाढ़ श्रद्धा व प्रीति होने
की वजह से श्रील गुरु महाराज जी ने सोचा कि यदि अब इन्हें अप्रीतिकर सत्य बात कही
जाये तो ये सहन कर लेंगे, क्योंकि कई बातें सत्य होने से भी वह सभी को, सभी समय
नहीं कही जा सकती। इसलिए विद्वान् व्यक्ति, ग्रहण करने का अधिकारी देखकर, उसके
अधिकार के अनुसार ही उसे उपदेश देते हैं।
श्रील गुरु महाराज जी ने मुस्कराते हुए श्रीबड़दलई को कहा- ‘यदि आप नाराज़ न तो
मैं अपना अभिमत व्यक्त करूँ?”
उत्तर में श्रीगोपीनाथ बड़दलई जी ने कहा- ‘आपके मूल्यवान उपदेशों को सुनकर हम
कृतार्थ हुए हैं। हमने इस प्रकार की ज्ञान से परिपूर्ण भागवत व्याख्या कभी किसी से
नहीं सुनी थी। आप हमारे मंगल के लिये कुछ कहें और हम असन्तुष्ट हों, ये हो ही नहीं
सकता। आप, स्वछन्दतापूर्वक अपना अभिमत व्यक्त कर सकते हैं।’
तब श्रील गुरुदेव जी ने कहा- जब मैं अपने घर में रहता था, तब कांग्रेस के
स्वाधीनता आन्दोलन से भी कुछ जुड़ा हुआ था। उस समय साबरमती से कांग्रेस की ‘Young
India’ नामक एक अंग्रेजी पत्रिका प्रकाशित होती थी। मैं उस पत्रिका को पढता था।
उसमे एक बार एक लेख मैंने पढ़ा था कि गाँधी जी ने किसी स्थान पर अपने भाषण में,
देशवासियों को अपना देश-प्रेम जताने के लिये कहा था की यदि जरुरत पड़े तो वे देश के
लिये अपनी अत्यन्त प्रिय ‘रामधुन’ का भी परित्याग कर सकते हैं। जहाँ तक मुझे याद
है, पत्रिका में लिखा था- I can sacrifice ‘Ramdhun’ for my country, किन्तु हम
लोग ठीक इसके विपरीत हैं- ‘we can sacrifice country for Ramdhun’. हमारे आराध्य
‘राम’ किसी के लिये नहीं हैं; वे स्वयं अपने लिये हैं एवं समस्त वस्तुएँ उनके लिये
हैं। पाश्चात्य दार्शनिकों ने भी ‘Absolute’ को इसी प्रकार संज्ञा दि है-
‘Absolute is for itself and by itself’, हम लोग It God नहीं कहते। हमारे भगवान्
परम पुरुष हैं, इसलिए हम लोग कहते हैं कि “Absolute is for HImself and by
Himself’ । भगवान् से ही अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड आते हैं; भगवान् में ही उनकी स्थिति
है तथा भगवान् के द्वारा ही उनका संरक्षण होता है- इसलिए अनन्त करोड़
विश्व-ब्रह्माण्ड भगवान् के लिये हैं। भगवान् की आराधना करने के लिये भगवद्-तत्त्व
को समझने की जरुरत है।”
Monday, 6 November 2017
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